भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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अगस्त 01, 2011

ज्योति


"यह कितना घोर अन्याय है की हम सब इक ही पिता की संतान होते हुए भी , एक-दूसरे से घ्रणा करें, ऊँच-नीच की व्यवस्था में मगन रहें| यह सारा जगत उसी परमपिता का विराट रूप है| प्रत्येक जीव में उसी परमात्मा की ज्योति आलोकित हो रही है| केवल इसी भौतिक परदे ने हमें एक - दूसरे से अलग कर दिया है| यतार्थ में हम सब एक हैं|


जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अलग-अलग घरों में जाकर भिन्न नहीं हो जाता, उसी प्रकार ईश्वर की महान आत्मा अलग-अलग जीवों में प्रविष्ट होकर भी विभिन्न नहीं होती|"
                                                                           - मुँशी प्रेमचंद

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमचंदजी ने कितना बड़ा सत्य व्यक्त किया है भेद केवल ऊपर ऊपर से है और कितना सुंदर है पर भीतर सभी एक हैं इंसान यह बात भूल गया है और व्यर्थ ही दुःख पा रहा है...

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  2. मुंशीजी के विचारों को पढ़ने का मौका देने के लिए धन्यवाद आपका .....

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...