भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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दिसंबर 03, 2010

आग




"बाहर की आग केवल देह का नाश करती है, जो स्वयं नश्वर है, भीतर की आग अनंत आत्मा का सर्वनाश कर देती है|"
                                                                          -मुँशी प्रेमचंद 

4 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है, नश्वर देह तो बार बार मिल जाती है पर आत्मा से मिलन कभी होता ही नहीं, विकारों की आग में उसका कोमल गात झुलस न जाता होगा !

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  2. आदरणीय इमरान अंसारी जी
    नमस्कार
    बहुत उम्दा विचार हैं आपके ...प्रेमचंद जी का अप्रतिम स्थान है , साहित्य जगत में ....आप प्रयास कर रहे हैं ,,,इसके लिए शुक्रिया

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  3. सच कहा, अन्दर की आग चाहे वह क्रोधाग्नि हो या कामाग्नि सब
    कुछ नष्ट कर देती है।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...