भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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सितंबर 06, 2011

त्याग

त्याग दो प्रकार के होते हैं | एक वह; जो त्याग में आनंद मानते हैं, जिनकी आत्मा को त्याग में संतोष और पूर्णता का अनुभव होता है, जिनके त्याग में उदारता और सौजन्य है |

दूसरे वह; जो दिलजले त्यागी होते हैं, जिनका त्याग अपनी परिस्तिथियों से विद्रोह मात्र है, जो अपने न्यायपथ पर चलने का तावान संसार से लेते हैं, जो खुद जलते हैं इसलिए दूसरों को भी जलाते हैं |
                                                                          - मुँशी प्रेमचंद

12 टिप्‍पणियां:

  1. प्रथम प्रकार के व्यक्तियों का त्याग भीतर परम शांति को भर जाता है...वे बहुत सभ हृदय के मालिक होते हैं, और दसरे प्रकार के त्यागी भीतर तनाव के सिवा और कुछ नहीं पाते क्योंकि उनका साध्य मात्र तात्कालिक परिस्थितियों से छुटकारा पाना था वे दुर्बल होते हैं..
    प्रेमचन्द जैसे लेखक दूध का दूध पानी का पानी करने में समर्थ हैं.

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  2. मुंशीजी के कथन को पढ़ने का अवसर दिया इसके लिए आपका धन्यवाद ...

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  3. सार्थक अंतर बताया आपने।

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  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।

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  5. त्याग की गरिमा इसमें है कि त्यागी को उसका एहसास न हो। अन्यथा,प्राप्त भी जाता रहता है।

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  6. बेनामीसितंबर 17, 2011

    सत्य कहा आपने व्यक्ति परिचय के पीछे कहीं न कहीं हम सब इनमे से एक वर्ग के प्राणी है ....

    चिंतान्परख लेख....बधाई आपको

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  7. अनमोल के साथ अनुपम भी।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...