भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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जनवरी 12, 2012

तृष्णा



"बुढापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छायें एक ही केंद्र पर आ जाती हैं |"


- मुँशी प्रेमचंद 

9 टिप्‍पणियां:

  1. तृष्णा एक रोग है, बुढ़ापा इस रोग के प्रकटीकरण का अंतिम समय...सच ही है क्योंकि मूल तृष्णा जीवन की है और व्यक्ति कितना भी बूढ़ा हो जाये, मृत्यु नहीं चाहता....

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  2. बुढ़ापे में भी इच्छा? तौबा-तौबा!

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  3. आपके ब्लाग पर आकर ,सत्य का सामना करना पड़ता है ....वो सत्य ....जिससे अक्सर इंसान भागता है........शेयर करते रहें...शुक्रिया

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    1. बेनामीजनवरी 16, 2012

      बहुत बहुत शुक्रिया वसुंधरा जी........सही कहा आपने.......इसी इए मैं इन ब्लॉगस को लिखता हूँ ताकि चरित्र का सही निर्माण हो सके |

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  4. बेनामीजनवरी 17, 2012

    बहुत बहुत शुक्रिया आप सभी का |

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  5. आपके इस उत्‍कृष्‍ठ लेखन के लिए आभार ।

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...