भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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जनवरी 28, 2012

शुद्ध - अशुद्ध

1920 ई. का एक चित्र भारत में
छुआछुत को दर्शाता (गूगल से साभार)

"मन और कर्म की शुद्धता ही धर्म का मूल तत्व है | वही ऊँचा है, जिसका मन शुद्ध है ; वही नीचा है, जिसका मन अशुद्ध है | जिसने वर्ण का स्वांग रचकर समाज के एक अंग को मदांध और दूसरे को मलेच्छ नहीं बनाया | किसी के लिए उन्नति या उद्धार का द्वार बंद नहीं किया | एक के माथे पर बड़प्पन का तिलक और दूसरे के माथे पर नीचता का कलंक नहीं लगाया |"

- मुँशी प्रेमचंद 



16 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेमचंद जी के बारे में कुछ कहना सूरज को दीपक दिखलाने वाली बात होगी.... !
    लेकिन , आई हूँ , तो कुछ तो लिख जाऊं.........
    उपर वाले(god , भगवान् या अल्लाह) ने केवल इंसान बनाया ,
    उन्हें शुद्ध या अशुद्ध , आपने , हमने या औरों (जिसकी लाठी उसकी भैंस) ने बनाई.... !!

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    1. शुक्रिया आपका | सहमत हूँ आपकी बातों से|

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  2. शत प्रतिशत सही बात...मन व कर्म की शुद्धता ही किसी को शुद्द या अशुद्ध बनाती है न कि जन्म...तथा कथित निम्न जाति में जन्म लेकर भी कोई कर्मों के कारण पूज्य बन सकता है.

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    1. शुक्रिया अनीता जी......मर्म को बिलकुल सही पहचाना आपने|

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  3. सार्थक पंक्तियाँ हैं प्रेम चंद जी की ...

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    1. इस सार्थक पोस्ट के लिए बधाई स्वीकार करें.
      कृपया मेरे ब्लॉग" meri kavitayen" पर पधार कर मेरे प्रयास को भी अपने स्नेह से अभिसिंचित करें, आभारी होऊंगा.

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  4. सार्थक पोस्ट ..बहुत सुन्दर...

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...