भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

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नवंबर 19, 2010

क्षमा


"क्षमा बदले के भय से नहीं माँगी जाती| भय से आदमी छिप जाता है, दूसरों की मदद माँगने दौड़ता है, क्षमा नहीं माँगता| क्षमा आदमी उसी वक़्त माँगता है, जब उसे अपने अन्याय और बुराई का विश्वास हो जाता है और जब उसकी आत्मा उसे लज्जित करती है|"


                                                                 - मुँशी प्रेमचंद  

4 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य

    और वह जो दिलों के द्वेष खत्म करना चाहता है।
    समर्थ व सक्षम हो हुए भी क्षमा मांगे।

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  2. kabhee kabhee kshama mang kar masle ko rafa dafa krna badappan kee nishanee bhee hai.

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  3. यानि कि वह जब बुराई के ऊपर उठ जाता है, जब वह निर्दोष होता है,सच्ची क्षमा तभी मांगी जाती है, पर आमतौर पर हम दिल से क्षमा कर नहीं पाते.

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  4. बहुत सुंदर .... हर पोस्ट एक जीवन दर्शन दे जाती है... धन्यवाद

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जो दे उसका भी भला....जो न दे उसका भी भला...