भारत ही नहीं वरन विश्व साहित्य में मुँशी प्रेमचंद जी का एक अलग स्थान है, और बना रहेगा | शायद ही कोई ऐसा साहित्य प्रेमी होगा, जिसने मुँशी प्रेमचंद जी को न पढ़ा हो | शायद अब उनके बारे में कुछ और कहने को बचा ही नहीं है| वो एक महान साहित्यकार ही नहीं, एक महान दार्शनिक भी थे | मेरी तरफ से उस महान कलम के सिपाही को एक श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित यह ब्लॉग, जिसमे मैं उनके अमूल्य साहित्य में से उनके कुछ महान विचार प्रस्तुत करूँगा........

Click here for Myspace Layouts

मार्च 12, 2012

अहित



"मानव - चरित्र कितना रहस्यमय है ? हम दूसरों का अहित करते हुए ज़रा भी नहीं हिचकते, किन्तु जब दूसरों के हाथों हमें कोई हानि पहुँचती है, तो हमारा खून खौलने लगता है ।"

- मुँशी प्रेमचंद 

फ़रवरी 13, 2012

उद्देश्य


"दुनिया अंधी है और दूसरों को अंधा बनाये रखना चाहती है । जो खुद अपने लिए नई राह निकलेगा उस पर संकीर्ण विचार वाले हँसे, तो क्या आश्चर्य है।

मानव जीवन का उद्देश्य कुछ और भी है, खाना, कमाना और मर जाना नहीं ।"

- मुँशी प्रेमचंद 

जनवरी 28, 2012

शुद्ध - अशुद्ध

1920 ई. का एक चित्र भारत में
छुआछुत को दर्शाता (गूगल से साभार)

"मन और कर्म की शुद्धता ही धर्म का मूल तत्व है | वही ऊँचा है, जिसका मन शुद्ध है ; वही नीचा है, जिसका मन अशुद्ध है | जिसने वर्ण का स्वांग रचकर समाज के एक अंग को मदांध और दूसरे को मलेच्छ नहीं बनाया | किसी के लिए उन्नति या उद्धार का द्वार बंद नहीं किया | एक के माथे पर बड़प्पन का तिलक और दूसरे के माथे पर नीचता का कलंक नहीं लगाया |"

- मुँशी प्रेमचंद 



जनवरी 12, 2012

तृष्णा



"बुढापा तृष्णा रोग का अंतिम समय है, जब सम्पूर्ण इच्छायें एक ही केंद्र पर आ जाती हैं |"


- मुँशी प्रेमचंद 

दिसंबर 29, 2011

बंधन


"जो विवाह को धर्म का बंधन नहीं समझता है, इसे केवल वासना की तृप्ति का साधन समझता है, वह पशु है |"
- मुँशी प्रेमचंद